देहरादून/गैरसैंण ,
उत्तराखंड विधानसभा के हालिया बजट सत्र (09–13 मार्च 2026, भराड़ीसैंण) के बाद गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इसी बीच सरकार द्वारा गैरसैंण को “स्मार्ट सिटी” के रूप में विकसित करने की घोषणा ने नई बहस छेड़ दी है।
पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के उस बयान से विवाद और गहरा गया, जिसमें उन्होंने भराड़ीसैंण विधानसभा भवन को “सफेद हाथी” बताते हुए उसे वेडिंग और कॉरपोरेट डेस्टिनेशन बनाने की बात कही। बढ़ते विरोध के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा में जवाब देते हुए कहा कि बजट में गैरसैंण को स्मार्ट सिटी बनाने का प्रावधान किया गया है।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि राज्य की जनता वर्षों से गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग करती रही है, न कि स्मार्ट सिटी। सवाल उठ रहा है कि जब मूलभूत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, तो “स्मार्ट सिटी” का मॉडल कितना व्यावहारिक होगा।
देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की हालिया रिपोर्ट ने भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार करोड़ों रुपये बिना ठोस योजना और पारदर्शिता के खर्च किए गए। कई परियोजनाओं के दस्तावेज ऑडिट के लिए प्रस्तुत ही नहीं किए गए, जबकि कुछ “स्मार्ट समाधान” क्रियान्वयन के दौरान ही हटा दिए गए।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि:
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4.55 करोड़ रुपये का बायोमेट्रिक वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम उपयोग में नहीं आ सका।
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5.91 करोड़ रुपये की स्मार्ट स्कूल परियोजना बिजली खर्च के कारण निष्प्रभावी रही।
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कई भुगतानों में अनियमितता और बिना दस्तावेज भुगतान पाए गए।
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कुछ नियुक्तियां नियमों को दरकिनार कर बैकडेट से की गईं।
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टेंडर प्रक्रिया का उल्लंघन कर कार्य आवंटित किए गए।
आलोचना यह भी है कि “स्मार्ट सिटी” के नाम पर ठोस विकास कम, दिखावटी कार्य अधिक हुए—जैसे एक जैसे साइनबोर्ड या कम उपयोग वाली इलेक्ट्रिक बसें।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब देहरादून में हजारों करोड़ खर्च के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, तो मात्र 30 करोड़ रुपये के बजट से गैरसैंण, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी को “स्मार्ट” कैसे बनाया जाएगा?
विश्लेषकों का मानना है कि सरकार को स्मार्ट सिटी के बजाय बुनियादी ढांचे और स्थायी राजधानी के मुद्दे पर स्पष्ट और ठोस नीति अपनानी चाहिए, अन्यथा यह योजना भी केवल कागजों तक सीमित रह सकती है।