रुद्रप्रयाग ,
चारधाम यात्रा के दौरान बार-बार हो रही हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रणालीगत चूक की ओर इशारा करती हैं। यात्रियों की आस्था और जीवन के बीच उड़ती यह सेवाएं अब सवालों के घेरे में हैं—क्या उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्यों में हवाई सेवाओं के लिए सुरक्षा मानकों को दरकिनार किया जा रहा है?
🚁 सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर: पहाड़ों में ‘खतरनाक उड़ान’
विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों में सिंगल इंजन हेलीकॉप्टरों की तैनाती एक खतरनाक समझौता है। तकनीकी खराबी की स्थिति में बैकअप इंजन न होने के कारण आपात स्थिति में जान बचाने की संभावना नगण्य हो जाती है। इसके बावजूद, कई कंपनियां लागत कम करने के लिए इन्हीं हेलीकॉप्टरों का प्रयोग कर रही हैं।
⚖️ यात्री भार मानकों की अनदेखी
DGCA ने हेलीकॉप्टरों में यात्रियों की सीमा (4 व्यस्क + 2 बच्चे + 2 शिशु) तय कर रखी है। लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार, 6-7 व्यस्क यात्रियों को एकसाथ बैठाया जा रहा है। यह न केवल संतुलन और एयरफ्रेम लोडिंग के लिए खतरनाक है, बल्कि दुर्घटनाओं का सीधा कारण भी बन सकता है।
🌧️ मौसम और समय: उड़ानें नियम तोड़ रहीं
खराब मौसम और निर्धारित समय सीमा (सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक) के उल्लंघन की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। कई ऑपरेटर खराब दृश्यता और उच्च पवन वेग के बावजूद उड़ानें संचालित कर रहे हैं—जिसे विशेषज्ञ ‘खुदकुशी से कम नहीं’ मानते हैं।
👨✈️ अनुभवहीन पायलट, ऊँचाई वाला प्रशिक्षण गायब
पर्वतीय उड़ानों के लिए हाई-एल्टीट्यूड फ्लाइंग का विशेष प्रशिक्षण जरूरी होता है। फिर भी, कई ऑपरेटर अधूरी योग्यता वाले या अनुभवहीन पायलटों से उड़ान करवा रहे हैं। यह लापरवाही यात्रियों की सुरक्षा से खुला खिलवाड़ है।
🔧 फिटनेस जांच और सर्विसिंग: क्या समय पर हो रही है?
जानकारी के मुताबिक, कई हेलीकॉप्टरों की फिटनेस सर्टिफिकेशन और मेंटेनेंस समय पर नहीं हो रहे। कुछ मामलों में DGCA ऑडिट में भी गड़बड़ियां सामने आई हैं, लेकिन कार्रवाई बहुत सीमित रही है।
❗ अब सवाल यह है: कितनी और दुर्घटनाएं?
कैलाश-मानसरोवर हो या केदारनाथ—इन पवित्र यात्राओं पर जाने वाले श्रद्धालु भरोसा लेकर उड़ते हैं। पर आज यह भरोसा हवाई सेवाओं की गैर-जिम्मेदारी के कारण टूटता दिख रहा है।
क्या DGCA, राज्य सरकार और ऑपरेटर अब भी जागेंगे?
यदि जल्द ही मानकों की कड़ाई से निगरानी, मौसम-आधारित उड़ान नियंत्रण, और पायलट चयन की प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं बनाया गया, तो हर यात्रा एक जुआ बन सकती है।