देहरादून ,
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के नए क्रिमिनल कोड के खिलाफ प्रतिवाद करते हुए भाकपा-माले की ओर से कानूनों की प्रतियां जलाकर विरोध व्यक्त किया गया। इस अवसर पर माले जिला सचिव डा कैलाश पाण्डेय ने इस अवसर पर कहा कि नए आपराधिक कानून भारत को एक पुलिस राज्य में बदल देंगे। उन्होंने कहा कि इसे हम एक संस्थागत स्थायी आपातकाल कह सकते हैं जहां पुलिस के पास मनमानी शक्तियां होंगी और असहमत नागरिकों पर जेल जाने का स्थायी खतरा होगा। उन्होंने कहा कि नए क्रिमिनल कोड नागरिक स्वतंत्रता और अधिकारों का हनन करने और सरकारी दमन बढ़ाने के औजार मात्र हैं। उन्होंने कहा कि इन पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह कानून अंग्रेजों के जमाने से भी ज्यादा खतरनाक हैं। उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न तबकों और न्याय पसंद नागरिकों के बीच इन तीन नए फौजदारी संहिताओं , भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को लेकर गम्भीर चिंता हैं। इन तीनों संहिताओं में (जो क्रमशः भारतीय दंड संहिता 1860, दंड प्रक्रिया सहित 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 का स्थान लेंगी। उन्होंने कहा कि मूलभूत नागरिक स्वतंत्रता जैसे बोलने, हक-अधिकार के लिए आवाज उठाने, प्रदर्शन की स्वतंत्रता और अन्य नागरिक अधिकारों को अपराध की श्रेणी में लाने वाले कठोर कानूनों का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि भूख हड़ताल को भी अपराध बना दिया गया है। उन्होंने कहा कि जबकि नए नामकरण के साथ कुख्यात राजद्रोह कानून भारतीय दंड संहिता आईपीसी की धारा 124 ए को कायम रखा गया है। इस अवसर पर अखिल भारतीय किसान महासभा के प्रदेश अध्यक्ष आनंद सिंह नेगी ने कहा कि नए कानूनों के जरिए पुलिस को अनियंत्रित शक्तियां दे दी गई हैं जिनका देश में नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि नागरिक सुरक्षा संहिता कानून के तहत अब जनता के सवालों को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठाना भी जुर्म हो गया है। ये प्रावधान जनता के अधिकार और किसी व्यक्ति की मानवीय गरिमा के हनन के अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि यह कानून पुलिस द्वारा नागरिकों को निशाना बनाए जाने को आसान करता है। उन्होंने कहा कि सबसे गंभीर यह है कि पुलिस अभिरक्षा की अवधि को वर्तमान 15 दिन से बढ़ाकर 60 या 90 दिन कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि किसी गिरफ्तार आरोपी का नाम, पता और अपराध की प्रवृत्ति का पुलिस स्टेशन और जिला मुख्यालय पर भौतिक एवं डिजिटल प्रदर्शन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसका मतलब है भाजपा सरकार जनता की आवाज को खामोश करने के लिए दमन और तेज करना चाहती है। उन्होंने कहा कि फौजदारी मामलों में पहले से ही पूरे भारत में चार करोड़ मुकदमंे लंबित हैं और उसके बीच में इन तीन कानूनों को लागू करना दो समानांतर कानूनी व्यवस्थाएं उत्पन्न करेगा, जिससे बैकलॉग और बढ़ेगा तथा पहले से अत्यधिक बोझ झेल रहे हमारे न्यायिक तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत के न्याय ढांचे को सुधार की अधिक जरूरत है लेकिन तीन फौजदारी कानून इसका जवाब नहीं है। उन्होंने कहा कि यह अकारण ही हड़बड़ी में बिना चर्चा या संसदीय परख के ऐसे समय में पास किए गए जब 146 विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया गया था।