देहरादून ,
दून अस्पताल की आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था में वरिष्ठ चिकित्सकों की कथित अनुपस्थिति और गंभीर रूप से घायल मरीज के उपचार में लापरवाही के आरोपों का मामला अब उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग पहुंच गया है। दैनिक समाचार पत्र में 28 जुलाई 2026 को प्रकाशित “सीनियर डॉक्टर नदारद, जूनियरों ने बचाई जान” खबर के आधार पर सामाजिक, आरटीआई एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता भूपेन्द्र कुमार लक्ष्मी ने आयोग के समक्ष जनहित में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि सिर, आंख, जबड़े और नाक पर गंभीर चोटों के साथ एक युवक को दून अस्पताल की इमरजेंसी में लाया गया था। आरोपों के अनुसार, ऐसी गंभीर स्थिति में संबंधित वरिष्ठ विशेषज्ञ चिकित्सकों की समय पर उपलब्धता को लेकर सवाल उठे। सीमित संसाधनों और वरिष्ठ चिकित्सकों के कथित मार्गदर्शन के अभाव में जूनियर डॉक्टरों ने टीम बनाकर मरीज का उपचार किया और जटिल सर्जरी कर उसकी जान बचाई।
शिकायत में वरिष्ठ चिकित्सकों की कथित अनुपस्थिति, न्यूरो सर्जरी विभाग के चिकित्सक के मौके पर नहीं पहुंचने तथा एक रेजिडेंट डॉक्टर द्वारा मरीज की केवल फोटो लेकर लौट जाने जैसे आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष गिरधर सिंह धर्मशक्तू ने शिकायत पर संज्ञान लिया है। आयोग की कार्रवाई सूची के अनुसार 4 अगस्त 2026 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी, देहरादून को नोटिस जारी किया गया। संबंधित समाचार पत्र की प्रति भी नोटिस के साथ भेजते हुए निर्धारित समय पर आख्या प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार पत्रावली 5 नवंबर 2026 को प्रस्तुत की जानी है।
शिकायतकर्ता ने घटना के समय ड्यूटी पर तैनात चिकित्सकों की उपस्थिति, ड्यूटी रोस्टर, उपलब्ध विशेषज्ञ चिकित्सकों के रिकॉर्ड और आवश्यकता पड़ने पर सीसीटीवी फुटेज की जांच कराने की मांग की है। साथ ही, जांच में लापरवाही या कर्तव्य में चूक साबित होने पर संबंधित चिकित्सकों और अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की मांग की गई है।
उन्होंने सरकारी अस्पतालों की इमरजेंसी में 24 घंटे आवश्यक विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और प्रभावी जवाबदेही एवं निगरानी व्यवस्था विकसित करने की भी मांग उठाई है।
“मामला किसी एक मरीज का नहीं, हर नागरिक के जीवन के अधिकार से जुड़ा है।” शिकायतकर्ता का कहना है कि आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सीधे नागरिकों के जीवन के अधिकार से जुड़ी है। अब मानवाधिकार आयोग के नोटिस के बाद स्वास्थ्य विभाग की आख्या और जांच के निष्कर्ष पर नजर रहेगी।