उत्तराखंड की राजनीति: 25 साल में स्थिरता नहीं, फिर कैबिनेट विस्तार पर सस्पेंस

भाजपा–कांग्रेस दोनों के दौर में बदले कई मुख्यमंत्री, 5 मंत्री पद खाली, कार्यकर्ताओं और जनता में बढ़ती नाराजगी

देहरादून ,
उत्तराखंड के 25 साल के राजनीतिक इतिहास में सत्ता की कुर्सी पर स्थिरता कभी नजर नहीं आई। भाजपा हो या कांग्रेस—दोनों ही दलों में नेताओं की महत्वाकांक्षाएं बार-बार उभरती रहीं। नतीजा यह हुआ कि जहां इस अवधि में अधिकतम पांच मुख्यमंत्री होने चाहिए थे, वहां अब तक मुख्यमंत्रियों की संख्या लगभग दर्जनभर तक पहुंच चुकी है।

राज्य में एक बार फिर राजनीतिक सुगबुगाहट तेज है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा सरकार आखिर मंत्रिमंडल विस्तार क्यों नहीं कर रही? मौजूदा समय में उत्तराखंड कैबिनेट के लगभग 5 मंत्री पद खाली हैं, लेकिन इसके बावजूद महीनों से विस्तार नहीं किया गया है। यह स्थिति न केवल विपक्ष बल्कि भाजपा के छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं को भी असहज कर रही है।

सरकार पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि चुनाव जीतकर बड़े पदों पर पहुंचे कई जनप्रतिनिधि जमीनी कार्यकर्ताओं और आम जनता से दूरी बना रहे हैं। जनसमस्याओं को अनसुना करने और सत्ता के घमंड में डूबे रहने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। हाल ही में राज्य के सबसे बड़े नगर निगम के एक युवा मेयर का मामला भी चर्चा में रहा, जहां एक फरियादी की समस्या को बार-बार नजरअंदाज किए जाने का आरोप लगा।

राजनीतिक गलियारों में यह भी याद दिलाया जा रहा है कि पूर्व में एक मुख्यमंत्री को भी गैरसैंण से दिल्ली के आदेश पर पद छोड़ना पड़ा था, जो सत्ता के घमंड का ही परिणाम माना गया।

फिलहाल चर्चा है कि उत्तराखंड में जल्द मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है, लेकिन कब और किसे मंत्री बनाया जाएगा, इस पर अभी भी सस्पेंस बरकरार है। 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा की यह देरी रणनीति है या मजबूरी—यह आने वाला समय ही बताएगा।

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