देहरादून ,
उत्तराखंड की भूमि सदियों से देवी-देवताओं की आराधना और आस्था की पवित्र धरा रही है। यहाँ की नदियाँ, पर्वत, घाटियाँ और मंदिर केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि भक्ति और लोकसंस्कृति के भी जीवंत प्रतीक हैं। इन्हीं पावन परंपराओं में से एक है नंदा देवी की डोली यात्रा, जो बीते बारह वर्षों से निरंतर आस्था और उत्साह के साथ आयोजित होती आ रही है। इस वर्ष भी यह यात्रा श्रद्धा, उत्साह और मातृशक्ति की अपार भागीदारी के साथ सम्पन्न हुई।
नवनिर्वाचित समिति के तत्वाधान में आयोजन
इस बार का आयोजन नंदा राजराजेश्वरी समिति की नवनिर्वाचित टीम के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। समिति के अध्यक्ष जय थपलियाल, सचिव गणेश सिलमाना और सांस्कृतिक सचिव हेमंत बुटोला ने इस धार्मिक यात्रा को पूरी जिम्मेदारी और समर्पण भाव से संपन्न कराया। उनके साथ सभी पदाधिकारी, कार्यकर्ता और स्थानीय लोग कंधे से कंधा मिलाकर लगे रहे। परिणामस्वरूप यह आयोजन एक ऐतिहासिक और अविस्मरणीय अध्याय बन गया।
मातृशक्ति का विशेष योगदान
नंदा देवी को लोक आस्था में ‘माँ’ का स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि इस यात्रा में असंख्य मातृशक्ति का विशेष योगदान रहा। महिलाएँ बड़ी संख्या में यात्रा में सम्मिलित हुईं, मां के भजन गाए और डोली के साथ कदम से कदम मिलाकर चलीं। यह दृश्य अपने आप में अनूठा था – जब महिलाएँ हाथों में दीप, पुष्प और नारियल लिए माता की जयकारे लगाती हुई चल रही थीं।
यात्रा का दिव्य अनुभव
यात्रा के दौरान मौसम ने कई बार परीक्षा ली। तेज़ बारिश भी हुई, मगर आस्था की डोर इतनी मजबूत रही कि बारिश में भी यात्रा रुकी नहीं। भक्तगण भीगते रहे, लेकिन मां नंदा देवी के जयकारों से वातावरण गूंजता रहा। यही उत्तराखंड की संस्कृति और भक्ति का असली स्वरूप है – कठिन परिस्थितियाँ भी श्रद्धा को डिगा नहीं सकतीं। डोली के भार के साथ जैसे मां की शक्ति स्वयं कंधों पर उतर आती है। हर कदम पर ऐसा लगता रहा मानो मां नंदा का आशीर्वाद साथ चल रहा हो।
भक्तों का उत्साह और आयोजन की भव्यता
यात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित हुए। कोई मां के भजन गा रहा था, कोई नृत्य कर रहा था, तो कोई भक्ति गीतों के साथ ताल मिला रहा था। स्थानीय कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि से वातावरण और अधिक दिव्य बन गया।
समिति की व्यवस्था भी अनुकरणीय रही। सुरक्षा, भोजन-प्रसाद, ठहरने और विश्राम की व्यवस्था सभी श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध कराई गई। हर जगह भक्तजनों को सहज सहयोग मिला। इससे यात्रा सुचारू रूप से सम्पन्न हो सकी।
विशिष्ट अतिथि और सामाजिक सहयोग
इस वर्ष की यात्रा में कई विशिष्ट अतिथि भी सम्मिलित हुए।
-
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत
-
सुनील उनियाल गामा जी
-
सौरभ थपलियाल
-
बृजभूषण गैरोला
-
विवेक कोठारी
-
कमली भट्ट
-
भूपेंद्र रावत (बब्बी)
-
अनूप नौडियाल
नंदा देवी का सांस्कृतिक महत्व
नंदा देवी केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान भी है। लोककथाओं और पर्व-त्योहारों में मां नंदा देवी का विशेष स्थान है। नंदा का अर्थ है आनंद और नंदा देवी को हिमालय की पुत्री के रूप में पूजा जाता है। डोली यात्रा के माध्यम से यह आस्था और परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
13 वर्षों की परंपरा
इस वर्ष डोली यात्रा का 13वां वर्ष था। पिछले बारह वर्षों से निरंतर आयोजित हो रही यह यात्रा अब एक स्थायी परंपरा का रूप ले चुकी है। हर वर्ष यह यात्रा और अधिक भव्य होती जा रही है और श्रद्धालुओं की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और आस्था से जोड़ने का कार्य करती है।
नव समिति को बधाई और आभार
इस भव्य और सफल आयोजन के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से जय थपलियाल जी, गणेश सिलमाना जी, हेमंत बुटोला जी सहित सभी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और श्रद्धालुओं को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। साथ ही मुझे इस पवित्र अवसर में सम्मिलित होने और डोली उठाने का सौभाग्य देने के लिए हृदय से धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।
निष्कर्ष : आस्था का पर्व
नंदा देवी की डोली यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और सामूहिक एकता का पर्व है। इसमें भाग लेकर हर कोई आध्यात्मिक आनंद और ऊर्जा से भर जाता है। बीते बारह वर्षों से यह परंपरा निरंतर चल रही है और हर बार नए उत्साह, नए संकल्प और नई आस्था के साथ यह यात्रा ऐतिहासिक बनती जा रही है।
सभी अतिथियों ने आयोजन की सराहना की और इसे लोक आस्था तथा सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक बताया। उनका कहना था कि नंदा देवी डोली यात्रा जैसी परंपराएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर हैं।
जय मां नंदा देवी!