न तो धराली आपदा पर चर्चा, न पंचायत चुनाव और कानून व्यवस्था पर बहस
देहरादून ,
गैरसैंण में चार दिन के लिए प्रस्तावित उत्तराखंड विधानसभा का मानसून सत्र महज़ दो घंटे 40 मिनट की कार्यवाही में समाप्त हो गया। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि विपक्ष ने काम रोको प्रस्ताव पर मतविभाजन की मांग की और लगातार वेल में धरना देते हुए रात को वहीं डेरा डाल दिया।
हंगामे के साए में सत्र
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विपक्ष ने धराली-हर्षिल आपदा, पंचायत चुनावों में हिंसा और धनबल-बाहुबल के प्रयोग तथा बिगड़ती कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर जोरदार बहस की मांग की।
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लेकिन हंगामे और राजनीतिक कटुता के चलते प्रश्नकाल पूरी तरह ठप हो गया।
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कार्यमंत्रणा समिति से नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह ने इस्तीफा तक दे दिया।
सरकार बनाम विपक्ष
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सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई कि इतने कम समय में नौ विधेयक पारित कराए और कई रिपोर्ट सदन पटल पर रखीं।
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विपक्ष ने कहा कि उसने जनता के मुद्दों पर सरकार को झुकने नहीं दिया और सत्र को जनता की पीड़ा के केंद्र में लाने की कोशिश की।
विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अक्सर यह “नूराकुश्ती” हो जाती है। विपक्ष हंगामा कर मुद्दे उठाने का दावा करता है जबकि सत्ता पक्ष बिना बहस के विधेयक पारित कराने का मौका पा जाता है। नतीजा—जनता से जुड़े असली सवाल सत्र से बाहर रह जाते हैं।
जनता का नुकसान
दोनों पक्ष अगर कुछ लचीलापन दिखाते तो जनता की गाढ़ी कमाई से चलने वाला यह सत्र सार्थक हो सकता था। लेकिन अब फिर वही होगा—कुछ दिन आरोप-प्रत्यारोप, और अगले सत्र में फिर से वही ढर्रा।