लोकसभा सचिवालय की चिट्ठी, लेकिन जनता ने कहा– “बंसल हैं ज़मीनी अफसर, सिस्टम को सुधारने में जुटे हैं”
देहरादून,
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में तैनात जिलाधिकारी सविन बंसल इन दिनों एक प्रशासनिक विवाद के केंद्र में आ गए हैं। मामला जुड़ा है लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के 12 जून को मसूरी दौरे से, जिसमें प्रोटोकॉल का पालन न किए जाने को लेकर लोकसभा सचिवालय ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है। इस संबंध में भारत सरकार के कार्मिक मंत्रालय और लोकसभा सचिवालय की ओर से सविन बंसल से तत्काल स्पष्टीकरण मांगा गया है।
क्या है मामला?
लोकसभा सचिवालय की चिट्ठी के अनुसार, अध्यक्ष ओम बिरला के मसूरी दौरे के दौरान उचित सम्मान व शिष्टाचार नहीं बरता गया। यह भी कहा गया कि लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय द्वारा फोन या मोबाइल पर संपर्क करने पर उचित उत्तर नहीं मिला, और प्रोटोकॉल मानकों का उल्लंघन हुआ। अब सचिवालय ने डीएम से पूरे घटनाक्रम की स्पष्ट रिपोर्ट शासन को तत्काल भेजने को कहा है।
जनता बोली– “नेताओं के लिए मुद्दा, लेकिन बंसल जनता के लिए मिसाल”
जहां एक ओर यह मामला प्रशासनिक हलकों में गर्म है, वहीं देहरादून की आम जनता का रुख बिल्कुल अलग है। लोगों का कहना है कि सविन बंसल उन गिने-चुने अधिकारियों में हैं जो वास्तव में ज़मीन पर काम कर रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बंसल ने न केवल गरीबों की मदद में पहल की है, बल्कि शासन-प्रशासन के कामकाज में भी पारदर्शिता लाने की कोशिश की है। हाल के दिनों में अवैध निर्माणों पर कार्रवाई, सड़क सुधार, जल आपूर्ति, आपदा प्रबंधन और जनसुनवाई जैसे मामलों में उनका प्रभावी नेतृत्व देखने को मिला है।
क्या यह राजनीतिक दबाव है?
विपक्षी खेमे से जुड़े कुछ लोगों ने इसे राजनीतिक दबाव का मामला बताया है। उनका कहना है कि “एक अधिकारी जो राजनीतिक रैलियों की बजाय प्रशासनिक ज़िम्मेदारी को तरजीह दे, उसके खिलाफ ऐसे ‘प्रोटोकॉल विवाद’ पैदा करना दुर्भाग्यपूर्ण है।”
डीएम की चुप्पी, प्रशासन की निगाहें
अब सबकी निगाहें सविन बंसल की प्रतिक्रिया और शासन को भेजी जाने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं। हालांकि अभी तक इस पूरे प्रकरण पर डीएम की ओर से कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है, लेकिन अफसरों के बीच यह चर्चा गर्म है कि यह मसला अधिक औपचारिकता बनाम कार्यकुशलता के टकराव का उदाहरण है।
जहां एक तरफ दिल्ली से आई चिट्ठी प्रोटोकॉल की औपचारिकताओं को लेकर है, वहीं देहरादून की जनता एक ज़मीनी अधिकारी के पक्ष में खड़ी नजर आ रही है, जो काम के बल पर भरोसा जीत रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि शासन इस मामले को प्रशासनिक भूल मानता है या राजनीतिक दबाव में निर्णय लेता है।





