देहरादून के खलंगा जंगल में ‘रिज़ॉर्ट राज’ का खुलासा — नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के गंभीर आरोप, भू-माफिया और सिस्टम पर उठे सवाल

 देहरादून ,

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां आरक्षित वन भूमि पर कथित अतिक्रमण और निर्माण कार्य से शासन-प्रशासन पर भू-माफियाओं की मिलीभगत के गंभीर आरोप लगे हैं।

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने मंगलवार को प्रेसवार्ता में आरोप लगाया कि खलंगा के जंगल में 40 बीघा आरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्जा कर रिज़ॉर्ट निर्माण शुरू किया गया है, और यह सबकुछ सरकारी तंत्र की आंखों के सामने हो रहा है।


🔎 क्या है पूरा मामला?

  • देहरादून के नालापानी क्षेत्र स्थित खलंगा जंगल, जो ऐतिहासिक रूप से गोरखा युद्ध का गवाह रहा है, वहां एक व्यक्ति ने खुद को भूमि का स्वामी बताकर जमीन लीज पर दे दी।

  • इसके बाद दूसरे व्यक्ति ने उस आरक्षित वन भूमि पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया, जबकि यह क्षेत्र वन अधिनियम के तहत संरक्षित है, जहां पत्ता तोड़ने के लिए भी अनुमति की आवश्यकता होती है।

  • हैरानी की बात यह है कि वन विभाग, राजस्व विभाग और पुलिस तक को इसकी जानकारी नहीं—या फिर वे जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं।


🏞️ जंगल की ऐतिहासिक और पारिस्थितिकीय महत्ता

  • खलंगा जंगल केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर भी है।

  • यह वही स्थल है, जहां 1814 में गोरखा सैनिकों और अंग्रेजों के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ था।

  • यहां मौजूद कुछ वृक्षों की उम्र 5000 साल तक मानी जाती है, और अब उन्हीं पेड़ों के नीचे सीमेंट और मशीनें गूंज रही हैं।


❗ नेता प्रतिपक्ष के आरोप और मांगें

  • यशपाल आर्य ने कहा:

    “वन विभाग अक्सर वनवासियों और गुर्जरों को परेशान करता है, लेकिन जब बड़े भू-माफिया जंगल में रिज़ॉर्ट खड़ा कर रहे हैं, तो पूरा सिस्टम मौन क्यों है?”

  • उन्होंने इस मुद्दे को एक सिस्टम की सड़न बताया और पूछा कि:

    “क्या आरक्षित वन भूमि अपने आप लीज पर चली जाती है?”

🛑 उनकी प्रमुख मांगें:

  1. उच्च स्तरीय और समयबद्ध जांच का आदेश दिया जाए।

  2. भूमाफिया, भ्रष्ट अधिकारियों और संबंधित नेताओं की भूमिका उजागर की जाए।

  3. वन भूमि पर अतिक्रमण रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से कार्रवाई हो।

  4. यह स्पष्ट किया जाए कि राज्यभर में कितनी आरक्षित वन भूमि इस तरह लीज पर दी जा चुकी है।


🌲 सवाल जो सिस्टम से पूछे जा रहे हैं:

  • क्या यह केवल एक ‘अवैध निर्माण’ है या किसी बड़े रैकेट की परतें खुल रही हैं?

  • यदि जनता को जंगल में प्रवेश की मनाही है, तो फिर बुलडोजर कैसे पहुंच गए?

  • क्या यह प्रशासनिक चूक है या प्रशासनिक सहभागिता?

खलंगा के जंगल में यह घटना केवल 40 बीघा भूमि की नहीं, बल्कि वन संरक्षण, प्रशासनिक जवाबदेही और पर्यावरणीय न्याय से जुड़ा बड़ा सवाल बन गई है।
इस पूरे मामले पर अब निगाहें राज्य सरकार की प्रतिक्रिया और जांच प्रक्रिया पर टिक गई हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *