नैनीताल ,
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) के प्रबंध निदेशक के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। यह याचिका समाजसेवी कहे जाने वाले बॉबी पंवार द्वारा दायर की गई थी, जिसमें टेंडर आवंटन में भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के गंभीर आरोप लगाए गए थे।
⚖️ कोर्ट का बड़ा फैसला:
🟠 हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने 6 जून को याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि:
“याचिका जनहित की आड़ में निजी स्वार्थ और राजनीतिक मंशा से प्रेरित प्रतीत होती है।”
🟠 कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी है कि यदि उनके पास साक्ष्य हैं, तो वे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सक्षम न्यायालय में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
🧾 मामले की पृष्ठभूमि:
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बॉबी पंवार ने वर्ष 2018 की पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन की जांच रिपोर्ट का हवाला देकर याचिका दायर की थी।
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उन्होंने आरोप लगाया कि UPCL के एमडी ने टेंडर आवंटन में भ्रष्टाचार किया और आय से अधिक संपत्ति जुटाई।
लेकिन…
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राज्य सरकार ने जवाब में अदालत को बताया कि 8 जुलाई 2024 को कार्मिक एवं सतर्कता विभाग ने इस मामले की जांच को बंद कर दिया था।
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महाधिवक्ता (AG) ने तर्क दिया कि बॉबी पंवार खुद कई मामलों में आरोपी हैं और चुनाव भी लड़ चुके हैं, अतः उनकी मंशा जनहित नहीं बल्कि निजी बदला और प्रचार था।
📚 कानूनी संदर्भ:
महाधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के झारखंड बनाम शिव शंकर शर्मा (2022) मामले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी याचिकाएं कोर्ट के समय और संसाधनों की बर्बादी होती हैं। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ही ऐसी शिकायतों की विवेचना के लिए उपयुक्त मंच है।
📌 राजनीतिक पड़ताल या सस्ती लोकप्रियता?
इस आदेश से जहां UPCL के MD को बड़ी राहत मिली है, वहीं बॉबी पंवार की छवि पर सवाल खड़े हो गए हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि PIL जनहित से अधिक ‘पैसा वसूल’ याचिका जैसी प्रतीत हो रही थी।
इस फैसले ने साफ कर दिया है कि जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग करने वालों पर अदालत अब सख्त रुख अपना रही है। बॉबी पंवार को अब सक्षम अदालत में साक्ष्य के साथ आगे बढ़ना होगा, अन्यथा यह मुद्दा भी राजनीतिक नौटंकी के रूप में ही देखा जाएगा।