छात्र संघ अध्यक्ष व संगठन पदाधिकारियों को रिहा करने की मांग
देहरादून ,
भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के द्वारा प्रदेश अध्यक्ष विकास नेगी के नेतृत्व में एडीजी एपी अंशुमान को ज्ञापन दिया जिसमे पुलिस द्वारा राज्य सरकार के दबाव में एनएसयूआई कार्यकर्ताओं पर एकतरफा कार्रवाई का विरोध किया गया। उन्होंने एनएसयूआई कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न रोकने व छात्र संघ अध्यक्ष व संगठन के पदाधिकारियों को रिहा किये जाने की भी मांग की। इस अवसर पर ज्ञापन में एनएसयूआई प्रदेश अध्यक्ष विकास नेगी ने कहा कि राजकीय महाविद्यालय बागेश्वर में एनएसयूआई एवं एबीवीपी छात्र गुटों के बीच हुए प्रकरण की ओर आकर्षित किया और कहा कि राजकीय महाविद्यालय बागेश्वर में एबीवीपी द्वारा बिना महाविद्यालय प्रशासन की अनुमति के महाविद्यालय में आरएसएस का कार्यक्रम आयोजित कराया गया। राजकीय महाविद्यालय बागेश्वर के छात्र संघ अध्यक्ष राहुल कुमार एवं एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष कमलेश गडिया द्वारा महाविद्यालय में बिना अनुमति के कराये जा रहे इस कार्यक्रम एवं आरएसएस की बैठक का विरोध किया गया। ज्ञापन में कहा गया कि जिसके प्रत्युत्तर में एबीवीपी के कार्यकर्ताओं द्वारा छात्र संघ अध्यक्ष एवं एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष के साथ मारपीट करते हुए जाति सूचक शब्दों का प्रयोग कर जान से मारने की धमकी एवं गाली गलौज की गई तथा राज्य सरकार के माध्यम से झूठे मुकदमें में फंसाने की धमकी दी गई। ज्ञापन में कहा गया कि इसके साथ ही कालेज प्रशासन से पूछने पर ज्ञात हुआ कि बैठक की पूर्व सूचना कालेज प्रशासन को नहीं दी गई। ज्ञापन में कहा गया कि राजकीय महाविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष राहुल कुमार द्वारा अपने सहपाठियों के साथ बैठक कक्ष में जाकर पूछताछ करने पर वहां पर उपस्थित सौरभ जोशी, हरेन्द्र दानू, विक्रम दानू, कविन्द्र रौतेला आदि छात्रों के साथ ही प्रोफेसर अमित जोशी, पंकज दूबे, उमेश जोशी आदि द्वारा छात्र संघ अध्यक्ष एवं उनके सहपाठियों के साथ मारपीट शुरू कर दी गई तथा जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए अभद्र गाली-गलौज की गई। ज्ञापन में कहा गया कि पुलिस को सूचना मिलने पर पुलिस द्वारा एबीवीपी की तहरीर ले ली गई परन्तु राज्य सरकार के दबाव में एनएसयूआई एवं छात्र संघ अध्यक्ष राहुल कुमार की तहरीर नही ली गई। ज्ञापन में कहा गया कि इसके साथ ही एनएसयूआई के पदाधिकारियों एवं छात्र संघ अध्यक्ष को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है जो कि न्याय संगत प्रतीत नहीं होता है।