देहरादून ,
उत्तराखण्ड कैबिनेट द्वारा पारित किया गया बहुत समय से लंबित बिल जिससे अब सिख विवाह आनंद क़ार्ज़ का रजिस्ट्रेशन आनंद मैरिज एक्ट के तहत किया जा सकेगा एक बहुत ही सराहनिये कदम है जिसके लिए उत्तराखाण्ड में रह रहे सभी सिख समुदाय सरकार का आभार व्यक्त करते हैं तथा इसकी संस्तुति से यह भी साफ़ हो गया है की इसको यूनिफार्म सिविल कोड़ का हिस्सा बनाने में सरकार की कोई मंशा नही है ।
सभी समुदायों के रीति रिवाज का सम्मान करना सरकारों का कर्तव्य है जिस का पालन मुख्यमन्त्री पुष्कर सिंह धामी जी की अध्यक्षता मैं हुई कैबिनेट की मीटिंग में हुआ है।
आनंद कारज मैरिज एक्ट की खास बात ये है कि इसके तहत जिन जोड़ों की शादी होती है उन्हें जन्म, विवाह और मृत्यु के लिए अन्य कानून के तहत पंजीकरण करने की जरूरत नहीं होती. सिखों की शादी संबंधित कानून 1909 के आनंद विवाह अधिनियम के अंतर्गत आते हैं. इसमें तलाक का कोई प्रावधान नहीं है.
पहले जानते हैं वर्तमान में क्या है नियम
फिलहाल भारत में शादी, तलाक, उत्तराधिकारी और गोद लेने के मामलों में अलग-अलग समुदायों में उनके धर्म, आस्था और विश्वास के आधार पर अलग-अलग क़ानून हैं. लेकिन समान नागरिक संहिता आने के बाद देश में किसी धर्म या समुदाय की परवाह किए बिना हर व्यक्ति पर एक ही कानून लागू होगा.
कैसे होता है आनंद विवाह
आनंद विवाह हिंदू विवाह से थोड़ा अलग है. हिंदू धर्म में शादी से पहले शुभ मुहूर्त, कुण्डली मिलान आदि किया जाता है. लेकिन, आनंद विवाह में ऐसा कुछ नहीं देखा जाता. सिख धर्म में विवाह को शुभ काम माना जाता है. जिसका मतलब है कि सुविधानुसार किसी भी दिन गुरुद्वारे में विवाह किया जा सकता है.
आनंद विवाह में केवल 4 फेरे होते हैं. जिसे लवाण, लावा या फेरे कहा जाता है. पहले फेरे में दूल्हा दुल्हन नाम जपते हुए सत्कर्म करने की सीख लेते हैं. दूसरे फेरे लेते वक्त ग्रंथी नए जोड़े को गुरु को पाने का रास्ता बताते हैं. तीसरे फेरे में जोड़े को गुरबाणी सिखाई जाती है और चौथे फेरे में मन की शांति और गुरु को पाने की अरदास की जाती है.
आनंद विवाह के पूरी रीति के वक्त अरदास चलती रहती है. जैसे फेरा खत्म होता है, नव विवाहित जोड़ा गुरु ग्रंथ साहिब और ग्रंथियों के सामने सिर झुकाता हैं. फिर प्रसाद बनाकर बांटा जाता है और शादी सम्पन्न हो जाती है.
क्या है आनंद विवाह एक्ट
सिख धर्म में शादी करने के लिए मान्यता के अनुसार ‘आनंद’ की रस्म निभाई जाती है. इस रस्म को सिख धर्म के तीसरे गुरु, गुरु अमरदास जी ने शुरू किया गया था. गुरु अमरदास जी ने ही 40 छंद लंबी बानी आनंदु की रचना की थी. इसे धार्मिक महत्व के सभी अवसरों और विवाह समारोहों के दौरान गाया जाता है. आनंद मैरिज एक्ट को सरकार ने भी अलग कानून बनाकर मान्यता दी है.
पहली बार आनंद मैरिज एक्ट को 1909 में ब्रिटिश काल में बनाया गया था. लेकिन उस वक्त किसी वजह से इस एक्ट को लागू नहीं किया जा सका. साल 2007 में जब सुप्रीम कोर्ट ने सभी धर्मों के लिए मैरिज रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया तो सिख समुदाय ने भी आनंद मैरिज एक्ट को लागू करने की मांग उठाई. इससे पहले तक सिखों समुदाय के लोगों की शादियां हिंदू मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर की जाती थी.
आनंद मैरिज एक्ट में पहले कई बार बदलाव भी किए जा चुके हैं. 7 जून 2012 को आनंद विवाह अधिनियम 1909 में संशोधन करते हुए दोनों सदनों ने आनंद विवाह संशोधन विधेयक 2012 को पारित किया था. इस अधिनियम के तहत सिख पारंपरिक विवाहों को मान्य करने के लिए आनंद का पंजीकरण अनिवार्य होगा. फिलहाल ये आनंद मैरिज एक्ट भारत के 22 राज्यों में लागू हो चुका है.
दूसरे शादियों से कैसे है आनंद मैरिज एक्ट अलग
आनंद कारज मैरिज एक्ट की खास बात ये है कि इसके तहत जिन जोड़ों की शादी होती है उन्हें जन्म, विवाह और मृत्यु के लिए अन्य कानून के तहत पंजीकरण करने की जरूरत नहीं होती.