नंदा देवी राजजात यात्रा: चौसिंग्या खाडू के साथ मां नंदा की कैलाश विदाई, आस्था और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम

हर 12 वर्ष में निकलने वाली हिमालयी यात्रा में छलक उठता है पहाड़ का बेटी के प्रति प्रेम

चमोली ,

देवभूमि उत्तराखण्ड की आराध्य देवी और पहाड़ की ध्याणी मानी जाने वाली मां नंदा देवी की राजजात यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की आस्था, संस्कृति और भावनाओं का जीवंत प्रतीक है। मां नंदा को मायके से उनके ससुराल कैलाश के लिए विदा करने की लोकपरंपरा से जुड़ी यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत को एक सूत्र में पिरोती है।

लोकमान्यताओं के अनुसार लगभग 12 वर्ष के अंतराल पर आयोजित होने वाली यह यात्रा हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों से होकर गुजरती है। श्रद्धालुओं और विभिन्न क्षेत्रों की देव डोलियों के साथ आगे बढ़ने वाली यात्रा में मां नंदा के प्रति लोगों की श्रद्धा और बेटी के प्रति पहाड़ की भावनात्मक आत्मीयता देखने को मिलती है।

चौसिंग्या खाडू है यात्रा की सबसे अनोखी परंपरा

नंदा देवी राजजात यात्रा की सबसे विशेष और चर्चित परंपराओं में चौसिंग्या खाडू, अर्थात चार सींग वाले मेढ़े का विशेष महत्व है। लोकमान्यता के अनुसार चौसिंग्या खाडू को मां नंदा का प्रतिनिधि और यात्रा का मार्गदर्शक माना जाता है।

यह खाडू यात्रा के दौरान मां नंदा की छंतोली और देव डोलियों के साथ हिमालय की कठिन यात्रा करता है। होमकुंड पहुंचने के बाद विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और परंपरा के अनुसार मां नंदा की भेंट एवं श्रृंगार सामग्री के साथ चौसिंग्या खाडू को कैलाश की दिशा में विदा किया जाता है।

चार सींग वाले मेढ़े का जन्म सामान्यतः दुर्लभ माना जाता है, इसलिए इसके प्रकट होने को भी धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है।

लोकगीतों और जागरों से गूंज उठा नंदा का मायका

मां नंदा की विदाई के दौरान श्रद्धालुओं और ध्याणियों की आंखें नम हो उठती हैं। लोकगीतों, जागरों, झोड़ा-चांचरी और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है।

श्रद्धालु मां नंदा की जयकारों के साथ कहते हैं—

“जय जय बोला जय भगोती नंदा,
नंदा ऊंचा कैलास की जय।”

पहाड़ की बेटी मानी जाने वाली मां नंदा की डोली जब गांवों से गुजरती है तो लोग अनाज, वस्त्र और अन्य भेंट अर्पित करते हैं। यह दृश्य मानो किसी बेटी को उसके मायके से विदा करने जैसा भावुक वातावरण पैदा करता है।

विभिन्न क्षेत्रों की डोलियां होंगी एकत्र

कुरुड़ से बधाण, दशोली और बंड क्षेत्र की नंदा डोलियां अपने पारंपरिक मार्गों से आगे बढ़ते हुए निर्धारित पड़ावों पर मिलेंगी। यात्रा के दौरान विभिन्न गांवों में देवी की डोली का स्वागत, पूजा-अर्चना और रात्रि प्रवास किया जाएगा।

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 12 सितंबर को रामणी में विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन होगा। इसके बाद यात्रा आला और कनोल होते हुए आगे बढ़ेगी।

15 सितंबर को वाण में लाटू देवता के मंदिर में डोली का प्रवास होगा। यहां विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचने वाली देव डोलियों का मिलन यात्रा का विशेष आकर्षण रहेगा। लोकमान्यता के अनुसार लाटू देवता को मां नंदा का धर्म भाई माना जाता है।

हिमालय के दुर्गम रास्तों से होमकुंड तक यात्रा

इसके बाद यात्रा हिमालय के ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों की ओर बढ़ेगी। 18 सितंबर को वेदनी बुग्याल में नंदा सप्तमी की विशेष पूजा आयोजित की जाएगी।

इसके बाद यात्रा पातर नचौणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड, ज्यूंरागली और शिलासमुद्र जैसे कठिन हिमालयी पड़ावों से होकर आगे बढ़ेगी।

20 सितंबर को शिलासमुद्र से पंचगंगा होते हुए होमकुंड पहुंचकर मां नंदा की विशेष पूजा-अर्चना और हवन किया जाएगा। यहीं चौसिंग्या खाडू को परंपरानुसार कैलाश की दिशा में विदा किया जाएगा।

पूजा-अर्चना के बाद यात्रा वापसी मार्ग से विभिन्न पड़ावों को पार करते हुए अपने निर्धारित धामों की ओर लौटेगी। इस दौरान उत्तराखण्ड के गांवों में नंदा के जागर, लोकगीत और पारंपरिक नृत्य-संगीत पूरी यात्रा को धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकसंस्कृति का जीवंत उत्सव बना देंगे।

राजजात और लोकजात में क्या अंतर है?

मां नंदा की लोकजात मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाली धार्मिक यात्रा है, जिसमें गांवों और क्षेत्रीय श्रद्धालुओं की प्रमुख भागीदारी होती है।

वहीं राजजात व्यापक और विशेष धार्मिक यात्रा मानी जाती है, जिसमें उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों की देव डोलियां और छंतोलियां शामिल होती हैं। चौसिंग्या खाडू की परंपरा और होमकुंड तक की कठिन हिमालयी यात्रा राजजात की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।

यात्रा के प्रमुख पड़ाव

नंदा देवी राजजात यात्रा के प्रमुख पड़ावों में नौटी, कांसुवा, सेम, कोटी, भगोती, नंदकेसरी, वाण, गैरोली पातल, वेदनी बुग्याल, पातर नचौणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड, ज्यूंरागली, शिलासमुद्र और होमकुंड शामिल हैं।

मां नंदा देवी की राजजात यात्रा उत्तराखण्ड की उस महान लोकपरंपरा का प्रतीक है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति, संस्कृति, लोकविश्वास और पहाड़ की बेटी के प्रति असीम प्रेम एक साथ दिखाई देता है।

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