सेना को भेड़, बकरी और पोल्ट्री उत्पाद की आपूर्ति करेंगे उत्तराखंड के किसान

चमोली से हुई ऐतिहासिक शुरुआत, सीमांत गांवों के लिए बनेगा स्थायी बाजार

देहरादून ,

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में उत्तराखंड ने एक और अहम कदम उठाया है। राज्य के स्थानीय किसान अब भारतीय सेना को भेड़, बकरी और पोल्ट्री उत्पाद उपलब्ध कराएंगे। इस पहल की शुरुआत जनपद चमोली से हुई है, जहां से माणा और मलारी की अग्रिम चौकियों के लिए पोल्ट्री उत्पादों की पहली खेप सोमवार को रवाना की गई।

इस अवसर पर मुख्य विकास अधिकारी डॉ. अभिषेक त्रिपाठी ने जोशीमठ से वाहनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह आपूर्ति स्थानीय पशुपालक गुलशन सिंह राणा और सौरभ नेगी द्वारा की गई।

🔹 पहल के उद्देश्य

  • स्थानीय पशुपालकों को स्थायी और सुनिश्चित बाजार उपलब्ध कराना

  • उत्पादन और आय में वृद्धि, साथ ही नियमित भुगतान की गारंटी

  • युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर प्रदान कर पलायन रोकना

  • सीमावर्ती क्षेत्रों के वाइब्रेंट गांवों को सशक्त बनाना

🐔 पोल्ट्री से शुरू, भविष्य में भेड़-बकरी की आपूर्ति भी

पशुपालन विभाग की इस रणनीति के पहले चरण में पोल्ट्री उत्पादों की आपूर्ति की जा रही है। भविष्य में यह दायरा बढ़ाकर जीवित भेड़-बकरी एवं अन्य पशु उत्पादों तक विस्तारित किया जाएगा।

इससे सीमावर्ती क्षेत्रों के पशुपालकों को सेना के रूप में एक संगठित व भरोसेमंद खरीदार मिलेगा, जो आर्थिक स्थिरता की दिशा में बड़ा योगदान होगा।

🤝 पूर्व एमओयू से मिली प्रेरणा

गौरतलब है कि उत्तराखंड पशुपालन विभाग ने पूर्व में आईटीबीपी (ITBP) के साथ एमओयू किया था, जिससे स्थानीय पशुपालकों को बाजार मिला। अब उसी तर्ज पर भारतीय सेना के साथ साझेदारी की जा रही है।

🗨️ मुख्यमंत्री का बयान

“चमोली से शुरू हुई यह ऐतिहासिक पहल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम है। सीमावर्ती गांवों के पशुपालकों को स्थायी बाजार मिलेगा और पलायन की समस्या पर भी अंकुश लगेगा।”
— पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री उत्तराखंड

👥 उपस्थित अधिकारी

  • डॉ. अभिषेक त्रिपाठी, मुख्य विकास अधिकारी

  • डॉ. अशीम देब, मुख्य पशुचिकित्सा अधिकारी

  • डॉ. पुनीत भट्ट, परियोजना समन्वयक, चमोली

भारतीय सेना के साथ यह साझेदारी न केवल स्थानीय कृषि और पशुपालन को सशक्त करेगी, बल्कि वाइब्रेंट विलेज योजना को जमीन पर मजबूती से उतारने में सहायक होगी। सीमांत क्षेत्रों में रह रहे पशुपालकों को अब अपनी उपज बेचने के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा—देश सेवा और ग्रामीण सशक्तिकरण का यह संयोजन एक मिसाल बन सकता है।

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