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शास्त्र सम्मत काल गणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरीः स्वामी एस चन्द्रा

भारतीय नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही माना जाता है
देहरादून ,

सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था शैल कला एवं ग्रामीण विकास समिति के तत्वावधान में भारतीय नववर्ष पर गोष्ठी में संस्था के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी एस. चन्द्रा ने प्रकाश डालते हुये कहा भारतीय नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही माना जाता है। इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। उन्होंने कहा कि आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्र सम्मत काल गणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है। इसे राष्ट्रीय गौरव शाली परंपरा का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने कहा कि विक्रमी संवत किसी संकुचित विचारधारा या पंथाश्रित नहीं है, हम इसको पंथ निरपेक्ष रूप में देखते हैं, यह संवत्सर किसी देवी, देवता या महान पुरुष के जन्म पर आधारित नहीं, ईस्वी या हिजरी सन की तरह किसी जाति अथवा संप्रदाय विशेष का नहीं है। हमारी गौरवशाली परंपरा विशुद्ध अर्थों में प्रकृति के खगोल शास्त्रीय सिद्धातों पर आधारित है भारतीय काल गणना का आधार पूर्णतया पंथ निरपेक्ष है। उन्होंने कहा कि प्रतिपदा का यह शुभ दिन भारत राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। ब्रह्मपुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की, यह भारतीयों की मान्यता है, इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्षारंभ मानते हैं, उन्होंने कहा कि आज भी हमारे देश में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोष आदि के चालन- संचालन में मार्च, अप्रैल के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं। यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है, इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं, प्रकृति नया रूप धर लेती है, प्रतीत होता है कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जा होती है। उन्होंने कहा कि मानव, पशु-पक्षी, यहां तक कि जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद और आलस्य को त्याग सचेतन हो जाती है, वसंतोत्सव का भी यही आधार है, इसी समय बर्फ पिघलने लगती है, आमों पर बौर आने लगता है, प्रकृति की हरीतिमा नवजीवन का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ जाती है। उन्होंने कहा कि इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2054 वर्ष पूर्व उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांत शकों से भारत-भू का रक्षण किया और इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की, उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमी संवत कह कर पुकारा। उन्होंने कहा कि महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2054 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का उन्मूलन कर देश से भगा दिया और उनके ही मूल स्थान अरब में विजयश्री प्राप्त की, साथ ही यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कंबोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहराई, उसी के स्मृति स्वरूप यह प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती थी और यह क्रम पृथ्वीराज चैहान के समय तक चला।

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