देहरादून,
राजधानी देहरादून स्थित सरकारी दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आयुष्मान भारत योजना के तहत एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। एक व्यक्ति के आयुष्मान कार्ड का उपयोग कर दूसरे मरीज का इलाज कराने के मामले में अस्पताल प्रशासन ने सख्त कार्रवाई करते हुए इलाज पर खर्च हुई 1.35 लाख रुपये की राशि की वसूली का निर्णय लिया है। साथ ही आरोपी के खिलाफ पुलिस में मुकदमा भी दर्ज कराया गया है।
जानकारी के अनुसार, गोविंदगढ़ निवासी मंजीत सिंह ने 26 मई को हृदय रोग के उपचार के लिए अपना आयुष्मान कार्ड और बायोमेट्रिक सत्यापन कराया था। आरोप है कि इसके बाद उसकी जगह विक्की नामक व्यक्ति को कार्डियोलॉजी विभाग में भर्ती कराकर उसका इलाज शुरू करा दिया गया। उपचार के दौरान मरीज की सभी आवश्यक जांचें की गईं और चिकित्सकों की निगरानी में उसकी एंजियोप्लास्टी भी की गई।
मामले का खुलासा तब हुआ जब 29 मई को उपचार पूरा होने के बाद मंजीत सिंह स्वयं अस्पताल के आयुष्मान काउंटर पर पहुंचा। वहां तैनात आयुष्मान मित्र को दस्तावेजों और मरीज के बीच अंतर दिखाई दिया, जिसके बाद उसने तत्काल अस्पताल प्रशासन को सूचना दी। प्रारंभिक जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि होने पर मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचाया गया।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, संबंधित मरीज के इलाज पर लगभग 1.35 लाख रुपये खर्च हुए हैं। प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी राशि आरोपी से वसूली जाएगी। अस्पताल सूत्रों के मुताबिक आरोपी रकम जमा कराने के लिए तैयार है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए दून मेडिकल कॉलेज की प्राचार्य डॉ. गीता जैन ने तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया है। समिति में डॉ. विवेकानंद सत्यवाली को अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि डॉ. वंदना बिष्ट और डॉ. पवनीश लोहान सदस्य के रूप में शामिल हैं। समिति को तीन कार्य दिवस के भीतर जांच रिपोर्ट और सुधारात्मक सुझाव प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
जांच समिति लाभार्थी सत्यापन प्रक्रिया, फोटो मिलान, आधार-बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और निगरानी तंत्र की विस्तृत समीक्षा करेगी, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
अस्पताल प्रशासन की तहरीर पर पुलिस ने आरोपी मंजीत सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस फर्जीवाड़े में किसी अन्य व्यक्ति या कर्मचारी की भूमिका तो नहीं रही।
यह मामला न केवल आयुष्मान योजना की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में सत्यापन प्रक्रिया की संभावित कमियों को भी उजागर करता है। अब सभी की निगाहें जांच समिति की रिपोर्ट और प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं।