देहरादून ,
आईआरआईए उत्तराखण्ड स्टेट चैप्टर की ओर से IRIA Uttarakhand State Chapter के सहयोग से Shri Mahant Indiresh Hospital में एक दिवसीय सीएमई (कन्टीन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन) कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक तकनीकों और शोध आधारित जानकारियों पर विशेष चर्चा हुई। मुख्य रूप से “फीटल ईको” विषय पर विशेषज्ञों ने विस्तार से जानकारी दी और गर्भ में पल रहे शिशु के हृदय की जांच के महत्व को रेखांकित किया।
सीएमई के दौरान फीटल ईको का लाइव डेमो भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें विशेषज्ञों ने इसकी प्रक्रिया और मेडिकल पक्ष को विस्तार से समझाया। कार्यक्रम में आईआरआईए उत्तराखण्ड स्टेट चैप्टर के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र गर्ग और सचिव डॉ. प्राची काला ने भी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं।
कार्यक्रम में उत्तराखण्ड के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों से आए रेडियोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट, फीटल मेडिसिन विशेषज्ञ और स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों सहित बड़ी संख्या में चिकित्सकों ने भाग लिया। आयोजन Shri Guru Ram Rai Institute of Medical and Health Sciences एवं श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल के सभागार में किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. मनोज शर्मा, सीएमओ देहरादून, Shri Guru Ram Rai University के कुलपति डॉ. प्रथापन पिल्लई, एसजीआरआर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंसेज के प्राचार्य डॉ. उत्कर्ष शर्मा, आयोजन अध्यक्ष डॉ. राजीव आजाद और आयोजन सचिव डॉ. राजेन्द्र श्रीवास्तव ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोज शर्मा ने कहा कि “फीटल ईको जैसी आधुनिक तकनीकें मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दे रही हैं। गर्भावस्था के दौरान ही हृदय संबंधी जटिलताओं की पहचान होने से समय पर उपचार संभव हो पाता है, जिससे नवजात शिशुओं की जीवन रक्षा में बड़ी मदद मिलती है।”
वहीं, कुलपति डॉ. प्रथापन पिल्लई ने कहा कि विश्वविद्यालय और अस्पताल चिकित्सा शिक्षा, शोध एवं आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे वैज्ञानिक कार्यक्रम चिकित्सकों के ज्ञानवर्धन के साथ-साथ मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में भी सहायक सिद्ध होते हैं।
सीएमई में मुख्य वक्ता के रूप में बैंगलौर से आए डॉ. सी. कृष्णा ने “फीटल ईको” पर विशेषज्ञ व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि यह अत्याधुनिक तकनीक गर्भ में पल रहे शिशु के हृदय की संरचना, धड़कन और कार्यप्रणाली की विस्तृत जांच करने में सक्षम है। इसके माध्यम से जन्मजात हृदय रोग, ब्लॉकेज, वाल्व संबंधी समस्याओं और अन्य जटिलताओं की समय रहते पहचान की जा सकती है।
डॉ. कृष्णा ने कहा कि यदि गर्भ में ही बच्चे की हृदय संबंधी बीमारी का पता चल जाए तो जन्म के तुरंत बाद उपचार की रणनीति तैयार की जा सकती है, जिससे नवजात की जान बचाने और बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने में सहायता मिलती है।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने आधुनिक रेडियोलॉजी, फीटल मेडिसिन और कार्डियक इमेजिंग के बढ़ते महत्व पर भी प्रकाश डाला। पूरे आयोजन के दौरान वैज्ञानिक चर्चा, केस स्टडी और अनुभवों का आदान-प्रदान किया गया।