शिमला बाईपास पर फिर भीषण सड़क हादसा, एंबुलेंस की देरी से गई युवती की जान

स्थानीय लोगों में आक्रोश, सड़क सुरक्षा और आपात सेवाओं की पोल खुली

देहरादून, 
शहर के शिमला बाईपास पर सोमवार को एक बार फिर भीषण सड़क हादसा हुआ, जिसमें स्कूटी सवार एक युवती बस की चपेट में आ गई और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोगों ने पुलिस को सूचना दी और चालक को मौके पर ही पकड़ लिया गया। लेकिन एंबुलेंस की 1 घंटे तक न पहुंच पाने से लोगों का आक्रोश फूट पड़ा।

एंबुलेंस की देरी से मौत, भड़के स्थानीय लोग

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घायल युवती को समय पर चिकित्सा सहायता मिलती तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। लोगों ने आरोप लगाया कि हादसे के बाद कई बार फोन करने के बावजूद एंबुलेंस नहीं पहुंची, जिससे घायल युवती ने तड़पते हुए दम तोड़ दिया।

पुलिस की त्वरित पहल, सिस्टम पर सवाल

आईएसबीटी चौकी इंचार्ज हर्ष अरोड़ा ने हालात की गंभीरता को देखते हुए एक निजी वाहन की मदद से युवती के शव को कोरोनेशन अस्पताल भिजवाया। हालांकि पुलिस की यह तत्परता सराहनीय रही, लेकिन इसने प्रशासनिक तैयारियों की पोल भी खोल दी। सवाल यह उठता है कि जब शहरी क्षेत्र में भी समय पर एंबुलेंस नहीं पहुंच रही, तो आपात सेवाओं की स्थिति आखिर कैसी है?

हादसों का ‘हॉटस्पॉट’ बनता शिमला बाईपास

शिमला बाईपास पर सड़क हादसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले एक सप्ताह में यह दूसरा हादसा है, जिसमें युवती की जान गई है। मुस्कान होटल के पास हुए पिछले हादसे के बाद भी प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, न ही यातायात नियंत्रण के कोई उपाय किए गए।

स्थानीय लोगों ने उठाई सड़क सुरक्षा की मांग

हादसे से नाराज स्थानीय लोगों ने सड़क सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों की मांग की है। उनका कहना है कि

  • ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं हो रहा,

  • बसें तेज रफ्तार और लापरवाही से दौड़ाई जा रही हैं,

  • और ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी बेहद कम है।

लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि शिमला बाईपास पर

  • गति सीमा निर्धारित की जाए,

  • सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं,

  • और बसों के संचालन पर कड़ी निगरानी रखी जाए।

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

लगातार हादसों के बावजूद प्रशासन की निष्क्रियता चिंता का विषय है। हर हादसे के बाद सिर्फ खानापूर्ति की जाती है, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया है।

यह हादसा एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर कब तक लापरवाह तंत्र की कीमत आम नागरिकों की जान से चुकाई जाती रहेगी?

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